Saturday, September 27, 2014

श्री चित्रगुप्‍त जी की पत्‍नी नन्दिनी ( सुदक्षिता ) से चार पुत्र क्रमश

1.धर्मध्‍वज ( श्रीवास्‍तव )
2. रामदयाल (सक्‍सैना)
3. योगाधर(माथुर)
4. भानुप्रकाश (भटनाकर) हुये।
शोभावती (इरावती) से आठ पुत्र क्रमश
1. श्‍याम सुन्‍दर (सुरज ध्‍वज)
2. सुमति (निगम)
3. सदानन्‍द (कुलश्रेष्‍ठ)
4. दामोदर (कर्ण)
5. धर्मदत्‍त (गौण)
6. दीनदयाल (अष्‍ठाना)
7. शार्ड् गधर ( अम्‍बष्‍ट) एवं
8. राधौराम ( बाल्‍मीकि) हुये।
चित्रगुप्‍त के सभी पुत्रों का उपनयन ( यज्ञोपवीत) संस्‍कार कश्‍यप जी के द्वारा कराया गया तथा सभी पुत्रों का विधाश्‍ययन 5 वर्ष की आयु में शुरू हुआ। श्री ब़हस्‍पति जी की छत्रछाया में सभी यथासमय सभी पुत्रों को बुलाकर उपदेश दिया कि हे पुत्रों तुम अपनी लेखन गणक व़त्ति रखना शास्‍त्र को अपनी जीविका ही नहीं अपितु युद्वादि समय में शास्‍त्र धारण कर युद्व भी करना , अपने शस्‍त्र तो कभी न छोडना । विधा के अभाव को अपने जीवन में कभी अंदर न आने देना, देवताओं का पूजन , ब्रहामणों का पोष्‍ज्ञझा तथा उनका आदर करना ताकि तीनों लोकों का कल्‍याण हो। इस प्रकार उपदेश देकर सभी को विभिन्‍न क्षेत्रों में म़त्‍युलोक भेजा जहां बारह भाई विभिन्‍न क्षेत्रों में जाकर बस गये।

श्री चित्रगुप्‍त जी ग़हस्‍त धर्म त्‍याग कर परमेश्‍वर की आज्ञा पाकर धर्मराज की सेवा में यमपुरी पहुंचें जहां धर्मराज ने सिहांसन से उठाकर प्रेम से चित्रगुप्‍त जी को हदय से लगा लिया तथा रन्‍नजडित मुकुट पहनाकर सिंहासन पर बैठाया। तदोपरान्‍त श्री चित्रगुप्‍त जी अपने कार्य में तल्‍लीन हो गयें।

Saturday, September 6, 2014

॥ ॐ यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नमः ॥

॥ ॐ यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नमः ॥
(हे धर्मराज चित्रगु#चित्रं वचो मायागत्यं, चित्रगुप्त स्मृतो गुरूवेरू। सगत्वा कोट नगर, चण्डी भजन तत्पररू।। (पद्य पुराण पाताल खण्ड)प्त , आप मेरे चित्त में व्याप्त हैं इसलिए आपका नाम चित्रगुप्त होगा । आपका वास नगर कोट में रहेगा और आप चण्डी के उपासक होंगे। - पद्य पुराण पाताल खण्ड)

#धर्मराज चित्रगुप्त: श्रवणों भास्करादय: कायस्थ तत्र पश्यनित पाप पुण्यं च सर्वश:’

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि धर्मराज चित्रगुप्त का राज्य सिंहासन यमपुरी में है और वो अपने न्यायालय में मनुष्यों के कर्मों के अनुसार उनका न्याय करते हैं तथा उनके कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं |

#चित्रगुप्तम, प्रणम्यादावात्मानं सर्वदेहीनाम। कायस्थ जन्म यथाथ्र्यान्वेष्णे नोच्यते मया।।

(सब देहधारियों में आत्मा के रूप में विधमान चित्रगुप्त को प्रमाण। कायस्थ का जन्म यर्थाथ के अन्वेषण (सत्य कि खोज ) हेतु ही हुआ है।

#यजुर्वेद आपस्तम्ब शाखा चतुर्थ खंड यम विचार प्रकरण से ज्ञात होता है कि महाराज चित्रगुप्त के वंसज चित्ररथ ( चैत्ररथ ) जो चित्रकुट के महाराजाधिराज थे और गौतम ऋषि के शिष्य थे ।

बहौश्य क्षत्रिय जाता कायस्थ अगतितवे।
चित्रगुप्त: सिथति: स्वर्गे चित्रोहिभूमण्डले।।
चैत्ररथ: सुतस्तस्य यशस्वी कुल दीपक:।
ऋषि वंशे समुदगतो गौतमो नाम सतम:।।
तस्य शिष्यो महाप्रशिचत्रकूटा चलाधिप:।।

“प्राचीन काल में क्षत्रियों में कायस्थ इस जगत में हुये उनके पूर्वज चित्रगुप्त स्वर्ग में निवास करते हैं तथा उनके
पुत्र चित्र इस भूमण्डल में सिथत है उसका पुत्र (वंसज ) चैत्रस्थ अत्यन्त यशस्वी और कुलदीपक है जो ऋषि-वंश
के महान ऋषि गौतम का शिष्य है वह अत्यन्त महाज्ञानी परम प्रतापी चित्रकूट का राजा है।”

#येनेदम स्वैच्छया, सर्वम, माययाम्मोहितम जगत।
स जयत्यजित: श्रीमान कायस्थ: परमेश्वर:।।

विष्णु धर्म सूत्र (विष्णु स्मृति ग्रंथ के प्रथम परिहास के प्रथम श्लोक में तो कायस्थ को परमेश्वर का रुप कहा गया है।

#यमांश्चैके-यमायधर्मराजाय मृतयवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय, कालाय, सर्वभूत क्षयाय च।।
औदुम्बराय, दघ्नाय नीलाय परमेषिठने।
वृकोदराय, चित्रायत्र चित्रगुप्ताय त नम:।।
एकैकस्य-त्रीसित्रजन दधज्जला´जलीन।
यावज्जन्मकृतम पापम, तत्क्षणा देव नश्यति।।

यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतों का क्षय करने वाले, औदुम्बर, चित्र, चित्रगुप्त, एकमेव, आजन्म
किये पापों को तत्क्षण नष्ट कर सकने में सक्षम, नील वर्ण आदि विशेषण चित्रगुप्त के परमप्रतापी स्वरूप का बखान करते
हैं। पुणयात्मों के लिए वे कल्याणकारी और पापियों के लिए कालस्वरूप है।

#कमलाकरभट्ट क्रित वृहत्ब्रहम्खण्ड् में लिखा है-

भवान क्षत्रिय वर्णश्च समस्थान समुद्भवात्। कायस्थ्: क्षत्रिय: ख्यातो भवान भुवि विराजते॥

#विद्या वाश्च्य शुचि; धीरो , दाता परोप्कराकः ! राज्य सेवी , क्षमाशील; कायस्थ सप्त लक्षणा ; !!

स्कंद पुराण में कायस्थ के सात लक्षणों को बताया गया है ।

Sunday, August 10, 2014

भोपाल. सावन माह के दूसरे सोमवार पर भी शिवालयों में तड़के से ही गूंजने लगे थे हर-हर ...

भोपाल। भोपाल विकास प्राधिकरण (बीडीए) मौजूदा कलेक्टोरेट के पास ही नेवरी गांव की 22 एकड़ जमीन पर नया कलेक्टोरेट बनाएगा। अगले तीन महीने में इसकी डीपीआर बनकर तैयार हो जाएगी। अधिकारियों ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है। बीडीए अधिकारियों की माने तो वर्तमान कलेक्टोरेट कार्यालय काफी पुराना हो चुका है। साथ ही स्टाफ और यहां पर आने वाले हितग्राहियों के लिए के बैठने जगह की कमी बनी रहती है। इसको देखते हुए शासन ने नए भवन का निर्माण कराने के लिए डीपीआर बनाने की बात कही है।





भोपाल । श्रावण मास के पहले सोमवार को सावन की रिमझिम फुहारों ने भी भगवान शिव का अभिषेक किया..लालघाटी स्थित प्राचीन नेवरी मंदिर रुद्राभिषेक

बारिश ने किया भोले का अभिषेक

भोपाल । श्रावण मास के पहले सोमवार को सावन की रिमझिम फुहारों ने भी भगवान शिव का अभिषेक किया। शिवालयों में श्रद्धालुओं ने जहां शिव का जलाभिषेक किया तो वहीं दूध, दही, शहद व पंचामृत से अभिषेक कर बेलपत्री, धतूरा व पुष्प अर्पित कर मनोकामना पूर्ण होने की कामना की। यह सिलसिला देर शाम तक चलता रहा। पूरा शहर शिवमय नजर आ रहा था, शिवालयों में बम बम. भोले. महादेव के जयकारे गूंज रहे थे तो वहीं भक्त रूद्री पाठ व शिव चालीसा का पाठ करने में व्यस्त थे। शहर के प्रमुख शिवालयों में शिव भक्तों का भोले के दर्शनों के लिए तांता लगा हुआ था। महिलाओं व पुरुषों ने सोमवार का व्रत रख शिव पुराण का पाठ किया।
गुफा मंदिर में लगा मेला
लालघाटी स्थित गुफा मंदिर में तड़के से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला प्रारंभ हो गया था, जहां उन्होंने भूतेश्वर महाराज का बेलपत्र व दूध, दही और शहद से अभिषेक किया। मंदिर परिसर में सुबह 21 ब्राहम्णों द्वारा रूदी अभिषेक पाठ, शिव महिमन, शिव तांडव आदि का पाठ किया गया। इस अवसर पर मंदिर परिसर में मेला का आयोजन किया गया। जिसमें बच्चों ने झूले झूलकर मस्ती की तो वहीं महिलाओं ने दुकानों से घर गृहस्थी का सामान खरीदा।
अलौकिक श्रृंगार शिव का
छोला विश्राम घाट स्थित मुक्तेश्वर महाकाल मंदिर शिवधाम मंदिर में भगवान भोलेनाथ अलौकिक श्रृंगार किया गया। यहां भगवान भोलेनाथ का अलग - अलग प्रकार से श्रृंगार किया गया।
फूलों से हुआ बड़वाले महादेव का श्रृंगार
बड़वाले महादेव मंदिर में श्रावण मास के पहले सोमवार को भगवान बटेश्वर का अनेक प्रकार के फूलों से श्रृंगार हुआ। इस दौरान श्रद्धालुओं में श्रृंगार दर्शन करने के लिए होड़ मची रही यह सिलसिला देर रात चलता रहा। रात्रि में आरती और जागरण का आयोजन किया गया।
बिड़ला मंदिर में हुआ शिव का रुद्राभिषेक
लक्ष्मीनारायण बिड़ला मंदिर में सुबह से लेकर रात्रि तक भक्तों का तांता लगा रहा। यहां सुबह भगवान भोलेनाथ का रुद्राभिषेक किया गया। शाम को विशेष पूजा-अर्चना व महाआरती का आयोजन किया गया। मंदिर परिसर के बाहर मेला भी लगाया गया।
11 लीटर दूध से हुआ अभिषेक
लालघाटी स्थित प्राचीन नेवरी मंदिर में भगवान भोलेनाथ का चारों पहर 11 लीटर से रुद्राभिषेक किया गया। इसी प्रकार शिव का विशेष श्रृंगार हुआ जिसमें भगवान को सेहरा पहनाया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रृंगार दर्शन करने पहुंचे।
कांवड़ियों ने किया अभिषेक
भोपाल। श्री बड़वाले महादेव मंदिर में श्रावण मास के पहले सोमवार को कांवड़ियों ने मां नर्मदा के जल से भगवान शिव का जलभिषेक किया। सेंट्रल लाइब्रेरी स्थित रामदेवरा मंदिर से कांवड़ यात्र पुन: प्रारंभ हुई, जो इतवारा, लखेरापुरा, भवानी चौक से होते हुए बड़वाले महादेव मंदिर पहुंची, जहां भगवान बटेश्वर की पूजा-अर्चना की गई। बड़वाले महादेव मंदिर में रात्रि में महाआरती और जागरण का आयोजन किया गया। समिति के प्रवक्ता प्रमोद नेमा ने बताया कि यात्र का चिंतामन चौराहे पर भव्य स्वागत किया गया तो वहीं भवानी चौक पर शिवसेना ने भी स्वागत किया।

Friday, August 1, 2014

महादेव - सबसे श्रेष्ठ देवता ...

गणेश-गण (भूतगण, जीब-गण) के स्वामी अर्थात समस्त प्राणियों तथा पदार्थो के परमाधिपति !
उमा - उ शिवं माति-मिमित्ते* जो भगवान शंकर में अभिन्न रूप से (अर्धनारीश्वर रूप में भी) स्थित होकर उन्हें माप रही हैं; जो शिव में व्याप्त हैं; वे पराशक्ति उमा हैं ! 
दुर्गा- दुःखेन गम्यते -जिनकी प्राप्ति बड़े कष्ट से होती हैं ! * दुर्गति नश्यति इति दुर्गा* जो भक्त की दुर्गति का निवारण करने वाली हैं, वे पराशक्ति *दुर्गा* कहि जाती हैं !
गणेश-गण (भूतगण, जीब-गण) के स्वामी अर्थात समस्त प्राणियों तथा पदार्थो के परमाधिपति !
महादेव - सबसे श्रेष्ठ देवता ! जो समस्त भावों को छोड़कर अपने ही ज्ञान एवं ऐश्वर्य से महिमान्वित हैं ! * देव प्रकाशक* अतः *महादेव*-परं प्रकाशक !
रूद्र -रुलाने वाले ! जो प्रलय-काल में प्रजा का संहार करके सबको रुलाते हैं, वे *रूद्र* ! अथवा *रुद ददाति* वाक् शक्ति के प्रदाता शिवपुराण के अनुसार *रूद्र* का अर्थ हैं -दुःखो तथा दुःखो के कारण दूर कर देने वाले ! रुद्रदुःखम दुःख-हेतुं वा तद द्रावयति यः प्रभु ! रूद्र इस्युच्यते तस्माच्छिवः परमकारणम् !!
शिव - निस्त्रैगुण्य - त्रिगुण-रहित शुद्ध सच्चिदानंद तत्व *शिव* कहलाता हैं ! अशुभ-निबारक, कल्याणस्वरूप होने से भी वे *शिव* कहे जाते हैं !
शंकर -*श* का अर्थ हैं- कल्याण ! जीव के परम कल्याणकर्ता होने से भगवान शिव को *शंकर* खा जाता हैं !

शम्भु-*शं* का अर्थ हैं मंगल ! वह जिसके द्वारा प्राप्त होता हैं, वे प्रभु *शम्भु* कहें जाते हैं !

He prayeth well who loveth well, Both man and bird and beast.He prayeth best who loveth best, All things both great and small;For the dear God who loveth us, He made and loveth all.O Lord of courage grave,O Master of this night of spring ! Make firm in me a heart too brave, To ask Thee anything.Who rises from prayer a better man, his prayer is answered.